शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2007

आई भोर

पेड पौधे जागें
पंछियों के मीठे
गीत जागें
खिली कलियाँ
फूल महके,
कलि कुसुमों पर
भौंरे इतराये
नए स्वप्न
नयी आशा,
आलस त्याग कर
जागी उषा,
चहु ओर मधुर शोर,
अब तो जागो मन
श्वेत परिधान
पहन कर
स्वागत करने,
बडे सवेरे
आई भोर !

2 टिप्‍पणियां:

Sonal Rastogi ने कहा…

sundar

Kuldeep Thakur ने कहा…

मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
आप की ये रचना 24-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।