शनिवार, 13 अप्रैल 2013

नानी के गाँव है जाना ... ( बालकविता )


ना कुछ सीखना,
ना समर कैंप में जाना 
मुझे तो छुट्टियों में 
नानी के गाँव है जाना ...

जहाँ,
कल-कल नदी एक बहती 
मधुर नाद सुनाती रहती 
गीली रेत पर नंगे पैर चलना 
ढेर सारी है सीपियाँ बटोरना 
नानी के गाँव है जाना ...

शीतल स्पर्श वह पानी का 
पैरों को गुदगुदाना मछलियों का 
आटे की गोलियाँ बना-बनाकर 
उनको है खिलाना 
नानी के गाँव है जाना ...

हरी-भरी वनराई और 
वनराई में गूँजता है जब 
चरवाहे के बन्सी का स्वर 
नाच उठता मन मयूर 
वन-उपवन में है विचरना 
नानी के गाँव है जाना ....

आमों की अमराई 
और ममता की छाँव 
भोले-भाले लोग 
प्यारा-सा वो गाँव 
डफली की ताल पर 
लोकगीत है सुनना 
नानी के गाँव है जाना ...!!

11 टिप्‍पणियां:

Sriram Roy ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति | शुभकामनायें....

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्यारा बालकविता.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत ही प्यारी सी ...मन भावन रचना ... मन को छूती है .. वापस लौटाती है ...

Neeraj Kumar ने कहा…

bahut khoob . aise nani ke gaon lekin ab bache kahan ab to ye sirf kavi kii kalpanaon me hi hai. sundar prastuti.

Suman ने कहा…

दस साल पहले एक पत्रिका में छपी थी यह कविता संकलन हेतु ब्लॉग पर डाला है !सच कहा आज के दौर में यह कविता महज एक कल्पना हो सकती है लेकिन मेरे बचपन का यह एक सच भी है जिसे मैं आज भी अनुभव करती हूँ .....बस एक आशा है शायद कल कभी ऐसा हो !

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

नानी का घर सब कैंपो और यात्राओं से सुखद लगता है. बहुत ही सुंदर रचना.

रामराम.

सरिता भाटिया ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि क़ी चर्चा सोमवार [15.4.2013]के चर्चामंच1215 पर लिंक क़ी गई है,
अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पधारे आपका स्वागत है | सूचनार्थ..

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बच्चों के मन की बात .... सुंदर बाल कविता

Ramakant Singh ने कहा…

आमों की अमराई
और ममता की छाँव
भोले-भाले लोग
प्यारा-सा वो गाँव
डफली की ताल पर
लोकगीत है सुनना
नानी के गाँव है जाना ...!!

बहुत सुन्दर बाल कविता.

आशा जोगळेकर ने कहा…

Aah Nani ke gaon jana. lahanpan ch gan mamachya gawala Jaoo ya atwal .

India Darpan ने कहा…

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।