सोमवार, 14 जून 2010

मेरी माँ

सबको अपनी -अपनी माँ प्यारी होती है
मुझको अपनी माँ सबसे प्यारी लगती है
सरल सुंदर मन की मधु मिश्री -सी मीठी,
माँ प्रेम और ममता की सरिता लगती है!
मेरी हर उलझन को चुटकी में सुलझाती,
घर को सजाकर कैसे सुंदर स्वर्ग बनाती,
माँ कभी पहेली तो कभी सहेली लगती है !
मेरी ख़ुशी में वह खुशीसे खिल जाती,
दुःख में मेरे फूल -सी मुरझाती,
माँ आँगन की फुलवारी लगती है !
कमजोर होता है जब मन लडखडाते है कदम,
अपने विश्वास भरे हाथों से थाम,
माँ कोई अनजानी प्रेरणा लगती है !
सुघड़ हाथो से तराश -तराश कर शिल्प बनाती ,
माँ है विश्वास,माँ है प्रेरणा ,माँ सर्वश्रेष्ट
भगवान की अनुपम भेट लगती है !

2 टिप्‍पणियां:

sanu shukla ने कहा…

atisundar...

indli ने कहा…

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।