गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

तुम मेरी कविता हो




जो अब तक कह न पायी
कभी, आज कह रही हूँ
मेरी प्यारी बिटिया ,
उस दिन अस्पताल के
लेबर रूम में,
नन्ही-सी, प्यारी-सी,
फूल सी कोमल, टावल में
लिपटी, नर्स के हाथ में
देख कर तुझको पल भर
भूल गयी मैं अपने आप को,
भूल गयी थोड़ी देर पहले की
वह प्रसव वेदना !
तुम क्या आई थी मेरे घर
जैसे बहार आ गयी थी,
तेरी मीठी किलकारियों से
महक-महक गयी मेरी
जीवन फुलवारी !
जिस दिन पहली बार तुमने
मुझे माँ कहकर पुकारा
ख़ुशी से मेरा रोम-रोम
हुआ रोमांचित,
तुम्हे पा-कर धन्य हुयी मैं
मातृत्व मेरा !
तुम्हारे लाड-प्यार में नटखट
बाल क्रीडाओं में खो सी गयी थी मैं ,
समय कब कैसे पंख लगाकर उड़ गया
पता ही न चला !
आज तुम्हारा १९ वा जन्म दिन है
बधाई हो !
सभी मेहमान आये हैं तुम्हे
बधाई देने को !
कोई कहता है तुम अपने
पापा पर गयी हो कोई कहता है
तुम मेरी ही प्रतिछाया हो
कोई कितना भी कहे मैं तो
अपनी ही कहूँगी
मेरी प्यारी गुडिया
छाया का कोई अस्तित्व नहीं होता
वह तो धुंदली होती है
काली होती है !
तुम तो हुबहूब मेरा ही
प्रतिबिम्ब हो
या की जीवन पाटी पर
लिखी हुई जीती-जागती जीवंत
कविता हो तुम मेरी !








( कन्या भ्रूण हत्या अक्षम्य
अपराध है! अपनी बेटियों को
बचाओ ! पाल-पोस कर खूब
पढाओ लिखाओ ! बेटियाँ घर की
शान है ! देश का गौरव है ! )

3 टिप्‍पणियां:

अनुपमा पाठक ने कहा…

बहुत भावपूर्ण एवं संदेशपूर्ण रचना!

Akshita (Pakhi) ने कहा…

आपने तो सुन्दर लिखा..बधाई.

'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

Sunil Kumar ने कहा…

bhavpoorn rachna achhi lagi ,badhai