शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

नेह निमंत्रण ...........


सच में मैंने,
कभी न चाहा था!
तुमको अपने 
ह्रदय का हाल 
सुनाऊं !
मेरे सुख-दुःख में,
तुमको अपना 
साझीदार 
बनाऊं !
उन भोले-भाले
नयनोंमे, 
दर्द का सावन 
भर दूँ !
वह तो तुम्हारे 
नेह निमंत्रण ने,
अनायास मेरे 
दिल का दर्द 
पिघल कर 
शब्दों में,
बह आया है !

21 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा आपने.

सादर

cmpershad ने कहा…

सुख दुख हमारे साथी हैं, इन्हें साझ न करें :)

ZEAL ने कहा…

वह तो तुम्हारे
नेह निमंत्रण ने,
अनायास मेरे
दिल का दर्द
पिघल कर
शब्दों में,
बह आया है ...

Sometimes we get so emotional by the touching and kind gestures of our friends.

.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मैंने चाहा तुम्हें हमराज़ बनाऊं
तुमसे ढेर सारी बातें करूँ
कभी कोई ओस आँखों से टपके
तो मैं गुलाब बन जाऊँ
..... यह नेह निमंत्रण मेरे अन्दर भी पिघलने लगा है

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

वह तो तुम्हारे
नेह निमंत्रण ने,
अनायास मेरे
दिल का दर्द
पिघल कर
शब्दों में,
बह आया है ...

बहुत सुंदर ...होता है ऐसा भी....

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत सुंदर/ बढ़िया लिखा आपने.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

इस नेह निमंत्रण की बधाई आपको .....

Radhe Radhe Satak Bihari ने कहा…

एक चोरी के मामले की सूचना :- दीप्ति नवाल जैसी उम्दा अदाकारा और रचनाकार की अनेको कविताएं कुछ बेहया और बेशर्म लोगों ने खुले आम चोरी की हैं। इनमे एक महाकवि चोर शिरोमणी हैं शेखर सुमन । दीप्ति नवाल की यह कविता यहां उनके ब्लाग पर देखिये और इसी कविता को महाकवि चोर शिरोमणी शेखर सुमन ने अपनी बताते हुये वटवृक्ष ब्लाग पर हुबहू छपवाया है और बेशर्मी की हद देखिये कि वहीं पर चोर शिरोमणी शेखर सुमन ने टिप्पणी करके पाठकों और वटवृक्ष ब्लाग मालिकों का आभार माना है. इसी कविता के साथ कवि के रूप में उनका परिचय भी छपा है. इस तरह दूसरों की रचनाओं को उठाकर अपने नाम से छपवाना क्या मानसिक दिवालिये पन और दूसरों को बेवकूफ़ समझने के अलावा क्या है? सजग पाठक जानता है कि किसकी क्या औकात है और रचना कहां से मारी गई है? क्या इस महा चोर कवि की लानत मलामत ब्लाग जगत करेगा? या यूं ही वाहवाही करके और चोरीयां करवाने के लिये उत्साहित करेगा?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Bahut khoob.
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क्या ब्लॉगिंग को अभी भी प्रोत्साहन की आवश्यकता है?

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

वह तो तुम्हारे
नेह निमंत्रण से,
अनायास मेरे
दिल का दर्द
पिघल कर
शब्दों में,
बह आया है ...
ऐसे ही होता है दिल का दर्द जो पत्थर होत जाता है पर दो स्नेह के बोल पाकर बहने लगता है ।

Amrita Tanmay ने कहा…

Bahar aana achchha hi hai....sundar abhivykti

Sunil Kumar ने कहा…

वह तो तुम्हारे
नेह निमंत्रण ने,
अनायास मेरे
दिल का दर्द
पिघल कर
शब्दों में,
बह आया है ...
बहुत बढ़िया.......

ज्योति सिंह ने कहा…

ise hi apnapan kahte hai ,sundar rachna .

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत खूब ..।

सतीश सक्सेना ने कहा…

अगर किसी पर भरोसा हो तो कष्ट बांटने में परस्पर विश्वास और बढ़ता है !
इसमें पछतावा क्या ...??

संजय भास्कर ने कहा…

दिल का दर्द
पिघल कर
शब्दों में,
बह आया है ...

बहुत सुंदर ...होता है ऐसा भी....

संजय भास्कर ने कहा…

कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
.....माफी चाहता हूँ..

विजय रंजन ने कहा…

bahut accha Suman ji...neh ka bandhan dravibhoot ho jaata hai....aur aankhen ghanibhoot peera ki badli si baras jaati hain...

हेमंत कुमार दुबे (Hemant Kumar Dubey) ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति |

Dilbag Virk ने कहा…

khoobsoorat
sahityasurbhi.blogspot.com

निशांत ने कहा…

acchi rachna...