गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

काफी है जीने के लिए ...

मान लो ,
मन नदी मानसरोवर 
उपर वासनाओं की लहरे 
निचे शीतल जल 
लगातार इन लहरों का 
चल रहा अर्थहीन -सा क्रम 
प्रवंचना के हवाई थपेड़े घेरे 
समीप किनारे शंख -सीप 
पसरे हो जैसे    … 
मृगछौने लंगड़ी इच्छायें ,
नदी गहराई में शांत जल
गहराई के भी भीतर छिपा 
प्रेम रूपी मुक्ता फल  
आओ , डुबकी लगाये 
इस प्रेम रूपी मुक्ता को 
उपर  लाये 
आकाश की तरह फैलायें 
गुलाब की तरह महकायें 
अपने-अपने   "मै " को 
छोटा  कर के हम  तुम  
मिल के  !
ऐसा प्रेम जरुरी ही नहीं 
काफी है जीने के लिए 
लेकिन  ,
"मै " इसमे बाधा है  !

13 टिप्‍पणियां:

Amrita Tanmay ने कहा…

अति सुन्दर ..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत बिम्बों का सहारा लिया है इस कविता में.. और अंत मन को स्पर्श करता हुआ... 'मैं' की बाधा ही तो सबसे बड़ी बाधा है... जिसने साध लिया उसका 'मैं' भी कहाँ छूटता है... कहता फिरता है मुझे देखो, मैंने 'मैं' को साध लिया है!!
बहुत सुन्दर!!

Suman ने कहा…

ओह बहुत सुन्दर सार्थक टिप्पणी की है इस रचना पर सलिल जी,
बहुत आभार इस टिप्पणी के लिए :)

Suman ने कहा…

@ जिसने साध लिया उसका 'मैं' भी कहाँ छूटता है... कहता फिरता है मुझे देखो, मैंने 'मैं' को साध लिया है!!
कहते फिरने में उद्घोष करने बस जरासा फर्क है शायद यही बात लोगों के समझ में नहीं आयी होगी इसीलिए बुद्धत्व प्राप्त व्यक्तियों को लोगों ने किसी को जहर दे दिया तो किसी को सूली पर चढ़ा दिया होगा :)

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

जो उद्घोष करते फिरते हैं वे कभी बुद्ध नहीं हो सकते... गौतम बुद्ध से जब किसी ने पूछा कि आपने क्या पाया, तो उन्होंने कहा कि पाया कुछ नहीं.. सब मिला ही हुआ था..!!
सुमन जी! अच्छा लगता है ऐसा सार्थक विमर्श! आभार आपका!

Satish Saxena ने कहा…

रचना और सलिल भाई की टिप्पणी आनंद दायक है !!

निहार रंजन ने कहा…

आशा है यह सन्देश सब के ह्रदय तक पहुंचे.

sushma 'आहुति' ने कहा…

प्यार की खुबसूरत अभिवयक्ति.......

Digamber Naswa ने कहा…

तभी तो गहरे डूब के निकलेगा ये प्रेम .. ऊपर की उथल पुथल से नीचे जाना होगा ... प्रेम को खोजना होगा ..

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से भावों को अभिव्यक्त किया है आपने, वाकई खूबसूरत.

रामराम.

Rachana ने कहा…

आकाश की तरह फैलायें
गुलाब की तरह महकायें
अपने-अपने "मै " को
छोटा कर के हम तुम
मिल के !
ऐसा प्रेम जरुरी ही नहीं
काफी है जीने के लिए
लेकिन ,
"मै " इसमे बाधा है !
bahut bahut badhai
rachana

संजय भास्‍कर ने कहा…

यह सन्देश सब के ह्रदय तक पहुंचे

jaspreet singh ने कहा…

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