बुधवार, 30 सितंबर 2009

प्रेम के दीप जलाओ

उमंग उल्लास आज मनपर है छाया
जगमग -जगमग दीपो का त्यौहार आया !
शरद के आगमन का यह जादू सारा
नववधू सी सज गई सारी वसुन्दरा!
अम्बर पर, धवल जोत्स्ना बिखर रही है
हरियाली पर ओस की बुँदे मोतीसी चमक रही है !
उध्यानोमे पराग भरे पुष्प खिलखिला रहे है
शाख -शाख पर चिडिया फुदक रही है !
वर्षा में उफनती सरीता, अब धीर मंथर बह रही है
कमल पंखुडियों पर भ्रमर गुनगुना रहे है !
आज प्रकृतिका जैसे हरदय खिल गया दूना
खुशियों से महक रहा है घर आँगन का कोना !
घर-घर में प्रेम के दीप जलाओ
दीपावली का पवन पर्व मनाओ !

2 टिप्‍पणियां:

Dr. shyam gupta ने कहा…

सुमन जी, बहुत सुन्दर,चित्रण है; बस दीपावली पर धवल ज्योत्सना नहीं होती।
---हमें साहित्य में विश्व सत्यों का द्यान रखना चाहिये।

Suman ने कहा…

namaste Dr.sahab agli bar mai apni trutiyon par vishes dhyan rakhungi.tippani ke liye bahut bahut dhanyevad.