शुक्रवार, 21 सितंबर 2007

मरू-उद्यान

ह्रदय के मरू उद्यान मे,
काव्यों के वृक्ष घने हैं
सतरंगी घटाओ मे ,
भावना के फूल खिले हैं
अमर बेलोंके झुरमुट मे
कोयल का नित प्रेम गान हैं
शीतल झरनों के संगीत में ,
अनहद का नाद छिपा हैं
पक्शियोंके चहचहाहट में
जीवन का वीतराग है
भूले भटके पल में ,
चाहे तो विश्राम यंहा है !

6 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 - 2011 को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द -

Dorothy ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छे बिम्बों से सजी खूबसूरत रचना ..

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत कविता।

सादर

रचना दीक्षित ने कहा…

सुन्दर अहसास ....

वीना ने कहा…

सुंदर एहसासों की रचना...