गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

जाड़े की नर्म धूप ....


कंपकपाती 
सर्द हवा 
शीतल सब 
गात है 
धरती के 
आगोश में 
उंघ रही 
रात है !

कुछ-कुछ 
सोया-सा 
तन 
कुछ जागा-सा 
मन है 
निंदियारी 
पलकों में 
सपनों के 
रूप है !

जब भोर
आंख खुली तो, 
प्राची में
फैल गए थे 
सिंदूरी रंग 
धीरे से ...
आंगन में 
सरक आयी थी 
जाड़े की नर्म 
धूप है ....!

10 टिप्‍पणियां:

sushmaa kumarri ने कहा…

खुबसूरत अभिवयक्ति.....

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

शानदार कविता बधाई

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

जाड़े की धूप की तरह उष्मा प्रदान करने वाली कविता!!

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना...
:-)

Ramakant Singh ने कहा…

जब भोर
आंख खुली तो,
प्राची में
फैल गए थे
सिंदूरी रंग
धीरे से ...
आंगन में
सरक आयी थी
जाड़े की नर्म
धूप है ....!

प्रकृति का सुन्दर चित्रण

Vandana Ramasingh ने कहा…

सुन्दर रचना

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

बहुत खूब
इस बार की ठण्ड अपने पूरे शबाब पर है :)

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जाड़े की इस नर्म धूप का मज़ा ही अलग है ...
खूबसूरत शेड बनाए हैं ...

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

आपकी प्रस्तुति निश्चय ही अत्यधिक प्रभावशाली और ह्रदय स्पर्शी लगी ....इसके लिए सादर आभार ......फुरसत के पलों में निगाहों को इधर भी करें शायद पसंद आ जाये
नववर्ष के आगमन पर अब कौन लिखेगा मंगल गीत ?

Asha Joglekar ने कहा…

सर्दी के मौसम की खूबसूरत कविता और नरम धूप से तो मन प्रसन्न हो गया ।