सोमवार, 16 सितंबर 2013

पत्ते -पत्ते पर लिख कर …


                 
  जब,
सुबह -सुबह 
पत्ते -पत्ते पर 
लिख कर 
प्रणय छंद  
हवा ने 
हौले से छुआ 
गुलाबी तन 
   तब,
खिल कर 
महक उठा 
 गुलाब 
मेरे आँगन में  ....! 

16 टिप्‍पणियां:

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

यूँ ही तो कलियाँ फूल बनती हैं.....
:-)

सुन्दर कविता है दी
सादर
अनु

Satish Saxena ने कहा…

सुगंध फैलती रहे ...

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत ही सुन्दर मनभावन...
:-)

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

सुबह ही कलियाँ खिलकर फुल बनती है ,बढ़िया अभिव्यक्ति
latest post: क्षमा प्रार्थना (रुबैयाँ छन्द )
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ताऊ रामपुरिया ने कहा…

प्रकृति के इन भावों को पकडना सहज मन की निशानी है, बखूबी अभिव्यक्त किया आपने, शुभकामनाएं.

रामराम.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यूं ही गुलाब खिलते रहें .... आँगन के साथ मन भी महकता रहे ॥

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यूं ही गुलाब खिलते रहें .... आँगन के साथ मन भी महकता रहे ॥

राजीव कुमार झा ने कहा…

आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 19/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कोमल पवन के साथ झूमते शब्द ... प्रेम की महक लिए ...

बेनामी ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति

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Ramakant Singh ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति

संजय भास्‍कर ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति

Asha Joglekar ने कहा…

वाह, यूं ही खिलते रहें प्रेम के गुलाब आपके आंगन में।

कुमार राधारमण ने कहा…

मन हो गुलाब,आंगन सुगंध
हो सांस-सांस में प्रणय-छंद

India Darpan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से आभार।