गुरुवार, 14 नवंबर 2013

जहाँ कवितायेँ नहीं, ऋचायें झरती है …

ओ  कवि  मन ,
आखिर कब तक 
यूँ  ही शब्दों से 
खेलते रहोगे  ? 
अविराम कब तक 
भटकते  रहोगे  ?
बहुत हो चुका 
प्रेम सपनों से 
कोरी कल्पनाओं से 
चलो शब्दों के पार 
परा  के पार की 
दुनिया में , जहाँ 
शब्द नहीं मौन 
बोलता है, जहाँ 
कवितायेँ नहीं ,
ऋचायें  झरती है  !
दुनिया  की सारी 
चिंताओं  से दूर 
सारी हदों के पार 
केवल अनहद में  
विश्राम ही विश्राम 
है जहाँ  पर  … !!

18 टिप्‍पणियां:

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

कवि सुनने वाला नहीं दी....
उसकी साँसे तो शब्द से ही चलती हैं.....

बहुत प्यारी रचना.....

सादर
अनु

Rajeev Kumar Jha ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना.
नई पोस्ट : पुनर्जन्म की अवधारणा : कितनी सही

Rajeev Kumar Jha ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (16-11-2013) "जीवन नहीं मरा करता है" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1431” पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

Ranjana verma ने कहा…

बहुत ही गहन भाव और बहुत ही बेहतरीन रचना ..

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

शायद अनहद ही अन्तिम पड़ाव है !गहन विचार
नई पोस्ट लोकतंत्र -स्तम्भ

Pramod Kumar Kush 'tanha' ने कहा…

बहुत ख़ूब ...

ओंकारनाथ मिश्र ने कहा…

सुन्दर आह्वान कवि से.

sushmaa kumarri ने कहा…

भावो का सुन्दर समायोजन......

मन के - मनके ने कहा…

खूबसूरत,रचना

Vaanbhatt ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति...

Satish Saxena ने कहा…

आज कल्पनाओं से हटकर चलें,जहाँ ऋतू हंसती है!
चले वहां जिस देश में केवल,वेद ऋचाएं झरती हैं !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शब्दों का मोह इतना ज्यादा होता है कवि को की भटकाव जीवन भर रहता है .. ये जाल टूट नहीं पाता ..

संतोष पाण्डेय ने कहा…

यही तो जीवन की मंजिल है।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

काश, उसके पार पहुंच पाते. बहुत ही सारगर्भित.

रामराम.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अगर तुमने कभी , नदी को गाते नही
प्रलाप करते हुए देखा हैं
और वहाँ कुछ देर ठहर कर
उस पर गौर किया हैं
तो मैं चाहूंगी तुमसे कभी मिलूं!

अगर तुमने पहाडों के
टूट - टूट कर बिखरने का दृश्य देखा हैं
और उनके आंखों की नमी महसूस की हैं
तो मैं चाहूंगी तुम्हारे पास थोडी देर बैठूं !

अगर तुमने कभी पतझड़ की आवाज़ सुनी हैं
रूदन के दर्द को पहचाना हैं
तो मैं तुम्हे अपना हमदर्द मानते हुए
तुमसे कुछ कहना चाहूंगी! …… स्व. सरस्वती प्रसाद

कहते-सुनते हैं कुछ आज की प्रतिभाओं से =

http://bulletinofblog.blogspot.in/2013/11/21.html

Asha Joglekar ने कहा…

शब्दों से परे बोलती है प्रकृति, झरती हैं ऋचाएं।

बहुत दिनों बाद यहां आने के लिये क्षमा चाहती हूँ सुमन जी, पर आप तो समझती हैं कि छह माह घर बंद हो तो सम्हालना समय तो मांगता है।

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति...भावपूर्ण कविता....

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…



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चलो शब्दों के पार
परा के पार की दुनिया में ,
जहाँ शब्द नहीं मौन बोलता है,
जहाँ कवितायेँ नहीं , ऋचायें झरती है !

वाह…!
आदरणीया सुमन जी
बहुत सुंदर कविता है !

हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
-राजेन्द्र स्वर्णकार