साँझ ढलते ही
मुरझाती है
सुबह होते ही
खिल जाती है
हरे-भरे परिधान में
छुई-मुई मेरे आँगन में
नाजुक-सा तन-बदन
सुमन-सी सुकुमारी
मृदु स्पर्श मात्र से
सिमट-सिमट कर
रह जाती
आते-जाते सबके
पुलक जगाती तन-मन में
छुई-मुई मेरे आँगन में
उसके निकट बैठू तो
आती है मुझको
उससे चंपा-सी गंध
पत्ते-पत्ते पर
लिख लाती है
नित नवे छंद
गुलाब भी झूमता है
मेहंदी के गीत में
छुई-मुई मेरे आँगन में !!
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
जीवन को महकाऊं कैसे
तू बता दे फूल मुझे ..........
मै तुझ सी खिल पाऊं कैसे?
तेरे जीवन पथ पर,
बीछे है कांटे फिर भी
उर में मुस्कान समेटे
पल-पल हवा के झोंके से,
खुशबू जग में ,
बिखराता है तू
तुझ जैसी खुशबु बिखराकर
जीवन को महकाऊ कैसे
तुझ सी खिल पाऊ कैसे?
सुबह को खिलता
साँझ मुरझाता
मंदिर मज़ार पर
बलिदान चढता
कितना सफल है
जीवन तेरा
मुझको खलती मेरी
नश्वरता !
तुझ जैसा बलिदान चढ़ाकर
जीवन को सफल
बनाऊ कैसे ? तुझ सी
खिल पाऊ कैसे?
मै तुझ सी खिल पाऊं कैसे?
तेरे जीवन पथ पर,
बीछे है कांटे फिर भी
उर में मुस्कान समेटे
पल-पल हवा के झोंके से,
खुशबू जग में ,
बिखराता है तू
तुझ जैसी खुशबु बिखराकर
जीवन को महकाऊ कैसे
तुझ सी खिल पाऊ कैसे?
सुबह को खिलता
साँझ मुरझाता
मंदिर मज़ार पर
बलिदान चढता
कितना सफल है
जीवन तेरा
मुझको खलती मेरी
नश्वरता !
तुझ जैसा बलिदान चढ़ाकर
जीवन को सफल
बनाऊ कैसे ? तुझ सी
खिल पाऊ कैसे?
रविवार, 23 जनवरी 2011
सवेरे -सवेरे
सवेरे-सवेरे
मीठे सपनों में
मै खोई हुयी थी
इस कदर नींद कुछ
गहरा गयी थी
की झटकेसे टूट गयी
ये किसने दी
आवाज मुझ को
सवेरे-सवेरे !
उषा कबसे खड़ी
स्वर्ण कलश लिए
हाथ में
किसकी अगवानी में
हवायें मीठी तान सुनाये
पंछी गीत मधुर गायें
दूर-दूर तक राह में
कौन बिछा गया
मखमली चादर हरी
सवेरे-सवरे !
कहो किसके स्वागत में
पलक -पावडे बिछाये
इस किनारे पेड़
उस किनारे पेड़
और बिच पथ पर
लाल पीली कलियाँ
किसने बिछायें है
फूल
सवेरे-सवेरे !
मीठे सपनों में
मै खोई हुयी थी
इस कदर नींद कुछ
गहरा गयी थी
की झटकेसे टूट गयी
ये किसने दी
आवाज मुझ को
सवेरे-सवेरे !
उषा कबसे खड़ी
स्वर्ण कलश लिए
हाथ में
किसकी अगवानी में
हवायें मीठी तान सुनाये
पंछी गीत मधुर गायें
दूर-दूर तक राह में
कौन बिछा गया
मखमली चादर हरी
सवेरे-सवरे !
कहो किसके स्वागत में
पलक -पावडे बिछाये
इस किनारे पेड़
उस किनारे पेड़
और बिच पथ पर
लाल पीली कलियाँ
किसने बिछायें है
फूल
सवेरे-सवेरे !
मंगलवार, 11 जनवरी 2011
कैक्टस
मन मरू में
कभी
बोये न होंगे
बीज
प्रेम के
तभी तो
आज
उग आये है
कैक्टस !
(२)
एक दिन
बूंद
सागरसे
बिछड़ कर
खूब रोई
पछताई
फिर से
गिरी
बूंद
सागर में
सागर हो गई!
(३)
आधुनिक सभ्यता
जैसे की
गुलदान में
सजे
रंगबिरंगी
कागज के
फूल
ना खुशबु
न महक !
कभी
बोये न होंगे
बीज
प्रेम के
तभी तो
आज
उग आये है
कैक्टस !
(२)
एक दिन
बूंद
सागरसे
बिछड़ कर
खूब रोई
पछताई
फिर से
गिरी
बूंद
सागर में
सागर हो गई!
(३)
आधुनिक सभ्यता
जैसे की
गुलदान में
सजे
रंगबिरंगी
कागज के
फूल
ना खुशबु
न महक !
बुधवार, 29 दिसंबर 2010
नए वर्ष का नया दिन !
दिन जो की,
कल भी वही था
आज भी वही है
नए वर्ष का नया दिन
खुद को बहलाने की
अच्छी तरकीब है !
जो कल भी आई थी
वही तो सुबह है
हाथ में फीकी चाय की प्याली
साथ में अख़बार और अख़बार में
वही बासी खबरे है !
भ्रष्टाचार,कालाबाजारी,
सब गड़बड़ घोटाले है
भ्रष्ट अफसर बेईमान नेताओंके
काले चिठे कारनामे है
नए साल में नया क्या है ?
पिछले साल भी
अधिक थी महंगाई
अब की बार और जादा है
आम आदमी को
प्याज कल भी रुलाता था
आज भी रुला रहा है
दुखों की फेहरिस्त लम्बी है दोस्तों
टूटे-टूटे सब सपने है
बुझी-बुझी आशाये है
जिसके भी दरवाजे जाओ
कोई गमगीन मिला
कोई बदहाल हुआ
यहाँ मरने के है लाख बहाने
पर जीने की कोई वजह
नहीं है !
(फेसबुक के सभी प्रशंसक ,सभी ब्लॉगर मित्रों को,
नए वर्ष की अनेक शुभकामनाये ! )
कल भी वही था
आज भी वही है
नए वर्ष का नया दिन
खुद को बहलाने की
अच्छी तरकीब है !
जो कल भी आई थी
वही तो सुबह है
हाथ में फीकी चाय की प्याली
साथ में अख़बार और अख़बार में
वही बासी खबरे है !
भ्रष्टाचार,कालाबाजारी,
सब गड़बड़ घोटाले है
भ्रष्ट अफसर बेईमान नेताओंके
काले चिठे कारनामे है
नए साल में नया क्या है ?
पिछले साल भी
अधिक थी महंगाई
अब की बार और जादा है
आम आदमी को
प्याज कल भी रुलाता था
आज भी रुला रहा है
दुखों की फेहरिस्त लम्बी है दोस्तों
टूटे-टूटे सब सपने है
बुझी-बुझी आशाये है
जिसके भी दरवाजे जाओ
कोई गमगीन मिला
कोई बदहाल हुआ
यहाँ मरने के है लाख बहाने
पर जीने की कोई वजह
नहीं है !
(फेसबुक के सभी प्रशंसक ,सभी ब्लॉगर मित्रों को,
नए वर्ष की अनेक शुभकामनाये ! )
सोमवार, 13 दिसंबर 2010
आयी भोर ....
पेड़- पौधे जागे
पंछियों के मीठे
गीत जागे
खिली कलियाँ
फूल महके
कलि कुसुमों पर
भौरे इतराए!
नये स्वप्न नई आशा
आलस त्यागकर,
जागी उषा
अब तो जागो मन!
श्वेत परिधान पहनकर ,
स्वागत करने
बड़े सवेरे आयी भोर ....!!
पंछियों के मीठे
गीत जागे
खिली कलियाँ
फूल महके
कलि कुसुमों पर
भौरे इतराए!
नये स्वप्न नई आशा
आलस त्यागकर,
जागी उषा
अब तो जागो मन!
श्वेत परिधान पहनकर ,
स्वागत करने
बड़े सवेरे आयी भोर ....!!
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
तुम मेरी कविता हो


जो अब तक कह न पायी
कभी, आज कह रही हूँ
मेरी प्यारी बिटिया ,
उस दिन अस्पताल के
लेबर रूम में,
नन्ही-सी, प्यारी-सी,
फूल सी कोमल, टावल में
लिपटी, नर्स के हाथ में
देख कर तुझको पल भर
भूल गयी मैं अपने आप को,
भूल गयी थोड़ी देर पहले की
वह प्रसव वेदना !
तुम क्या आई थी मेरे घर
जैसे बहार आ गयी थी,
तेरी मीठी किलकारियों से
महक-महक गयी मेरी
जीवन फुलवारी !
जिस दिन पहली बार तुमने
मुझे माँ कहकर पुकारा
ख़ुशी से मेरा रोम-रोम
हुआ रोमांचित,
तुम्हे पा-कर धन्य हुयी मैं
मातृत्व मेरा !
तुम्हारे लाड-प्यार में नटखट
बाल क्रीडाओं में खो सी गयी थी मैं ,
समय कब कैसे पंख लगाकर उड़ गया
पता ही न चला !
आज तुम्हारा १९ वा जन्म दिन है
बधाई हो !
सभी मेहमान आये हैं तुम्हे
बधाई देने को !
कोई कहता है तुम अपने
पापा पर गयी हो कोई कहता है
तुम मेरी ही प्रतिछाया हो
कोई कितना भी कहे मैं तो
अपनी ही कहूँगी
मेरी प्यारी गुडिया
छाया का कोई अस्तित्व नहीं होता
वह तो धुंदली होती है
काली होती है !
तुम तो हुबहूब मेरा ही
प्रतिबिम्ब हो
या की जीवन पाटी पर
लिखी हुई जीती-जागती जीवंत
कविता हो तुम मेरी !
( कन्या भ्रूण हत्या अक्षम्य
अपराध है! अपनी बेटियों को
बचाओ ! पाल-पोस कर खूब
पढाओ लिखाओ ! बेटियाँ घर की
शान है ! देश का गौरव है ! )
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