कल वर्ष भर के
सारे सुप्त सुख
लौट आये थे
एक दिन में,
एक दिन में,
आल्हादित हुआ
था मन अपने इस
एक दिन के
भाग्य पर
समय और भाग्य ने
एक दिन का देवत्व
होने का गौरव
जो प्रदान किया था !
दुसरे दिन ...
सुबह पांच बजे
आलार्म का
कर्णकर्कश स्वर
मानो कह रहा था
अगर एक दिन का
देवता होने का भ्रम
दूर हुआ हो तो उठो
"उठो ...देव
कितने सारे काम
करने है ..
डेयरी से दूध लाना है
चाय बनानी है
पीने का पानी
नल से भरना है
सब्जी लानी है
गिनती बढती जा
रही थी .....!
