बुधवार, 19 जून 2013

एकता का महत्व ....

एक दिन ,
रंगों में बहस छिड़ 
गई कि ,वही  सबसे 
अच्छा रंग है ..
"मै जीवन व आशा का 
प्रतीक हूँ  हरे रंग ने 
दावा किया " ..
"मै आसमान  व समुद्र की 
गहराई का प्रतीक हूँ 
मेरे बिना जीवन में 
शांति ,सुख असंभव है 
नीले  रंग ने दावा किया "...
इस प्रकार से हर रंग 
अपनी-अपनी योग्यता का 
बखान करने लगे ...
इतने मे ,
आसमान  में जोर-जोर से 
बिजली कडाड कडकी 
काले -काले बादल छा गए 
जोर की वर्षा  होने के 
आसार दिखाई देने लगे !
सारे रंग बिखरने के 
डर  से एक दूसरे के 
पास  आने लगे 
एक दूसरे का हाथ 
थाम कर आकाश में 
इन्द्रधनुष बन कर 
दुनिया को एकता का 
पाठ पढ़ा कर 
यह सन्देश देने 
लगे कि ,
हर रंग एक दुसरे के 
बिन अधुरा है .....!!

मंगलवार, 28 मई 2013

छंद सधते नही है आज ...

आज,
अक्षर-अक्षर 
बिखर रहे है 
छंद सधते नहीं 
रूठ गये है 
सहज सरल 
भाव मन के ..,

कैसे हो स्वर 
साधन ?
कुछ अधिक 
ढीले ढाले है 
कुछ अधिक 
कसे हुए है 
मन वीणा के 
तार आज ...!

गुरुवार, 9 मई 2013

फूलों के बीज ....


मानसून आते ही 
ठंडी-ठंडी हवायें 
सरसराने लगती है 
हृदयाकाश में छाये 
भावों के मेघ 
मन की धरती पर 
बरसने को उतावले 
हो जाते है ...
बारिश की इन 
भाव भरी रिमझिम 
फुहारों से जब 
मन की मिट्टी 
गीली होने लगती है 
तब बो देती हूँ 
इस गीली मिट्टी में 
फूलों के
मन पसंद बीज 
और जब यह बीज 
टूटकर,गलकर
अंकुरित हो 
पौधे हवावों की 
सरसराती ताल पर 
फूलों सहित 
झूम झूम कर नाचने, 
गीत गाने लगते है 
तब फूलों की 
इस सुगंध से 
सारा जीवन महकने 
लगता है  जैसे .....!

( फूलों के बीजों का अभाव है 
  नहीं तो मिट्टी में भी फूल 
  छिपे होते है ..)

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

नानी के गाँव है जाना ... ( बालकविता )


ना कुछ सीखना,
ना समर कैंप में जाना 
मुझे तो छुट्टियों में 
नानी के गाँव है जाना ...

जहाँ,
कल-कल नदी एक बहती 
मधुर नाद सुनाती रहती 
गीली रेत पर नंगे पैर चलना 
ढेर सारी है सीपियाँ बटोरना 
नानी के गाँव है जाना ...

शीतल स्पर्श वह पानी का 
पैरों को गुदगुदाना मछलियों का 
आटे की गोलियाँ बना-बनाकर 
उनको है खिलाना 
नानी के गाँव है जाना ...

हरी-भरी वनराई और 
वनराई में गूँजता है जब 
चरवाहे के बन्सी का स्वर 
नाच उठता मन मयूर 
वन-उपवन में है विचरना 
नानी के गाँव है जाना ....

आमों की अमराई 
और ममता की छाँव 
भोले-भाले लोग 
प्यारा-सा वो गाँव 
डफली की ताल पर 
लोकगीत है सुनना 
नानी के गाँव है जाना ...!!

बुधवार, 20 मार्च 2013

क्षणिकाएँ ...


जैसे ...
आकाश की 
पृष्ठभूमि पर 
बादल
जैसे ...
सागर की 
पृष्ठभूमि पर 
लहर
वैसे ही 
चेतना की 
पृष्ठभूमि पर
विचार ...!

***
सुख के क्षण 
सरपट दौड़ते है 
दुःख के क्षण 
काटे नहीं 
कटते 
लंगड़ा कर 
चलते है 
शायद इसे ही 
समय सापेक्षता का 
सिद्धांत कहते है ...!

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

कौन नींद से मुझे जगाता ...


अक्सर मै 
सोचती हूँ 
फिर भी 
मन है कि 
समझ न पाता 
साँझ-सवेरे 
नील गगन में, 
अनगिनत 
झिलमिल दीप 
कौन जलाता 
कौन बुझाता !
भोर से पहले 
पंछी जागते,
फूल,पत्तों पर 
कौन धवल 
मोती बिखराता !
सवेरे-सवेरे 
फूल खिल जाते, 
हवाओं में कैसे 
सौरभ भर जाता !
पल भर में 
भौरों को कौन 
सन्देश पहुंचाता !
कोयल के सुरीले 
कंठ से गाकर
कौन नींद से 
मुझे जगाता .....?

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

ढाई अक्षर प्रेम के ....


जितने चाहो 
लिख डालो 
प्रेम ग्रंथ 
किन्तु, 
ढाई अक्षर 
प्रेम के 
समझ न आते 
अक्सर 
कहते सुनते 
हर बार 
मन के भाव 
अनकहे ही 
रह जाते ....!

    ***
प्रेम क्या है ?
सदियों से अनेकों ने 
अनेकों बार अनेक 
रीतियों से,अभिव्यक्तियों से 
कहना चाहा 
प्रेम की परिभाषा को 
किसी ने समझा भी 
या नहीं पता नहीं 
किस भांति ?
जब भी कहना चाहा 
तब शब्दों में कहाँ 
व्यक्त हो पाया वो 
जो शेष है अभी ....!