सोमवार, 20 जुलाई 2009

मेरा घर

आइये,
ये है हमारा छोटा घर
स्वीट होम, लिखा है दरवाजे
पर !
इधर फाइल में उलझे है पापा
कोर्ट कचेरी का इनका पेशा
बीजी रहते है हमेशा !
उधर किचन में हलवा बना
रही है मम्मी,
पयार में उसके नही कोई
कमी !
उस स्टडी रूम में भय्या है पढ़ता
करियेर की खाती उसको
चिंता!
कभी कभार ही मुझको है मिल
पात!
दूर कोने में मई , आकेली उदास
तभी कविता मेरी आती है पास
मन की सारी बात वहा जान
जाती है
चुपके से कान में कुछ
कह जाती है !

छा गए बादल

घिर -घिर कर
आ गए बादल
नील गगन में
काले -काले
छा गए बदल !
सर्द हुए हवा के झोंके
कडाद नभ में
बिजली चमके
तप्त धरा की
प्यास बुझाकर
नदियोमे जल भरने
आ गए बादल
छा गए बादल !
वन उपवन में अब
होंगी हरियाली
शुक, पिकी मैनाये
नाच उठेगी
खेत खालिहानोमे
खुशहाली होंगी
गाव -गाव सहर
अमृत जल बरसाने
आ गए बादल
छा गए बादल !
हर्ष -हर्ष कर वर्षा
कुछ ऐसे बरसी
चातक मन तृप्त हुवा
बूंद स्वाती की मोती बनी
मन के आँगन में
छमा छम छम छम
बूंदों के नुपुर
खनका गए बादल
बरस गए बादल !

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

जब तुमसे प्रेम हुआ है

तुमको अपना हाल सुनाने
लिख रही हूँ पाती
प्रिय प्राण मेरे
यकीन मानो
अपना ऐसा हाल हुआ है
जबसे मुझको प्रेम हुआ है
जग का अपना दस्तूर पुराना
चरित्र हिन् कहकर देता ताना
बिठाया चाहत पर
पहरे पर पहरा
नवल है प्रीत प्रणय की
कैसे छुपाऊ
ह्रदय खोल कर अपना
कहो किसको बताऊ
अपने भी जैसे

लगते पराये है
जबसे मुझको प्रेम हुआ है
कौन समझाए इन नैनो को
बात तुम्हारी करते है
पलकों पर निशि दिन
स्वप्न तुम्हारे सजाते है
जानती हु स्वप्नातीत
है रूप तुम्हारा
मन प्राण मेरा प्रिय
उस रूप पर मरता है
जबसे मुझको प्रेम हुआ है
तुम्हारी याद में
तुम तक पहुँचाने को

नित गीत नया लिखती हु
भावों की पाटी पर प्रियतम
चित्र तुम्हारा रंगती हु
किंतु छंद न सधता
अक्षर अक्षर बिखरा
थकी तुलिका
बनी आडी तिरछी रेखाएं
अक्स तुम्हारा नही ढला है
जबसे मुझको प्रेम हुआ है !






गुरुवार, 11 सितंबर 2008

सवेरे सवेरे

सवेरे सवेरे
मीठे सपनों मे
मै खोई हुई थी
इस कदर नींद कुछ
गहरा गई थी
कि झटके से टूट गई
ये किसने दी आवाज मुझको
सवेरे सवेरे ?
उषा कबसे खड़ी
स्वर्ण कलश लिए
हात में
किसकी अगवानी में
हवायें  मीठी तान सुनाये
पंछी गीत मधुर गाये
दूर-दूर तक राह में
कौन बिछा गया
मखमली चादर हरी
सवेरे- सवेरे ?
कहो किसके स्वागत में
पलक पावडे बिछाये
इस किनारे पेड़
उस किनारे पेड़
और बीच पथ पर
लाल पीली कलियाँ
ये किसने बिछाये है फूल
सवेरे-सवेरे   .... 

सोमवार, 30 जून 2008

सर्दी आई

हवा ठंडी
रात ठंडी
स्वप्न मीठे
नींद मीठी
भाए माँ की ,
गोद मीठी
वसुधा की मृदु शय्या पर,
निशि ने वोड़ ली
काली रजाई
सर्दी आई

रिमझिम

रिमझिम आई बरखा
नभ में,
कड़अड़ कड़ कड़
बिजली चमकी
काले -काले बादल छाये रे
रिमझिम -रिमझिम
आई बरखा
ठंडी चली पुरवाई रे
बीत गए अब
दिन गर्मी के
नही रहे गर्म
लू के झोंके
ताप मिटा धरती का
जनजीवन में खुश हाली रे
कबसे आंगन में
रिमझिम बरसा बरस रही
कानो में रस घोल रही
झरझर- झरझर जैसे
लय ताल बद्ध संगीत रे
धीरे -धीरे हौले -हौले
खोल पिसारा नाच
मुग्ध मनमयूर नाच
नाच छम छनना नाच रे?

मई का महिना

गर्मी के दिन
मई का महिना
आग उगलता सूरज
पिघलती सड़क
भागते दौड़ते लोग
पसिनेसे तरबतर
चारो और मोटर गाड़ियों का शोर
सुभसे शाम निरंतर?
मंजिलोपर मंजिल
गगन चुम्बी इमारते
छोटे छोटे घर
छोटासा परिवार
बंद सब खिड़किया
झांकती नही चांदनी
छत ना आंगन
कूलर पंखे की घर-घर्र
रातभर
नींद मे डालते खलल
मछर
घुटन भरी जिंदगी
मुश्किल है जीना
मई का महिना