skip to main
|
skip to sidebar
Main aur Meri Kavitayen
शनिवार, 10 नवंबर 2012
रात की निस्तब्धता को चीर कर ...
विश्वास
श्रद्धा की
ज्योति
ज
ब भी
ड
गमगाने
लगती है
तब
तुम
चूपके से
घर मेरे
आ जाते हो
बुझते इन
दीपों में
स्नेह तेल
भर जाते हो
रात की
निस्तब्धता को
चीर कर ...
शुक्रवार, 2 नवंबर 2012
एक दिन का देवता ....
कल वर्ष भर के
सारे सुप्त सुख
लौट आये थे
एक दिन में,
आल्हादित हुआ
था मन अपने इस
एक दिन के
भाग्य पर
समय और भाग्य ने
एक दिन का देवत्व
होने का गौरव
जो प्रदान किया था !
दुसरे दिन ...
सुबह पांच बजे
आलार्म का
कर्णकर्कश स्वर
मानो कह रहा था
अगर एक दिन का
देवता होने का भ्रम
दूर हुआ हो तो उठो
"उठो ...देव
कितने सारे काम
करने है ..
डेयरी से दूध लाना है
चाय बनानी है
पीने का पानी
नल से भरना है
सब्जी लानी है
गिनती बढती जा
रही थी .....!
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
हम भी महक ले जरा .....
चाँद ,
महक तुम्हारी
बढ़ जायेगी खास
फलक पर आ
हम भी महक
ले जरा ...
जी भर कर
निहार लेंगे
तूम भी
निहार लो
हमे जरा ....
आज
बादलों में क्यों
छूप गये हो तूम
स्याह बादल
हटाओ जरा ....
रविवार, 21 अक्टूबर 2012
कोई एक कविता ...
फूल का महत्व
उसके सुगंध में
निहित है तो,
कविता का महत्व
उसके भावों में
निहित है !
कितना ही सुंदर
फूल क्यों न हो
गंध रहित हो तो
महत्वहीन लगता है
जब तोता अपनी
चोंच गुलर के
फूल पर मारता है
तब भीतर से निकल
आती है गंधहीन रूई
ऐसे ही लगती है
कोई एक कविता
पढ़ते-पढ़ते
दिल को छू लेती है
कोई एक कविता !
सोमवार, 8 अक्टूबर 2012
जीवन का सच ...
मृत्यु
जन्म के साथ ही
जन्म लेती है
बढती है हर पल
प्रौढ़ होती है !
मृत्यु
आती है कहीं भी
कभी भी हर घडी
हर मोड़ पर खड़ी !
मृत्यु
आती है कभी
रात के सन्नाटे में
चुपचाप दबेपांव
पंजों के बल !
मृत्यु
आती है कभी
दोपहर के उजाले में
ललकारती हुई
होटों पर
कुटिल
मुस्कान लिये !
मृत्यु
जीवन का सच
रामनाम सत्य
इस सत्य को जब तक
स्वीकार नहीं करेगा
नहीं करेगा समर्पण
जीवन की धार में
तब तक लड़ता रहा है
लड़ता रहेगा वंशज
भगीरथ का काल से
नहीं मानेगा हार .....
शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
शंख-सीप...
मन नदी
मान सरोवर
समीप किनारे
शंख-सीप
उपर लहरे
निचे जल
भीतर गहरे
मुक्ता फल
चुगता मोती
राज हंस !
रविवार, 16 सितंबर 2012
भोर हुई ....
भोर हुई
उठो जागो
सारे
नील गगन में
छुप गए
तारे !
पूर्व दिशा में
लाली छाई
जीवन रस
छलकाती उषा
आई !
गुलशन-गुलशन
फूल है खिले
पंछी भी चले
अंबर को छूने !
डाल-डाल पर
चिड़िया फुदक
रही है
ठंडी-ठंडी हवा भी
गा रही है !
पूजा घर में
मधुर आरती बोले
भोर हुई उठो
जागो सारे !
नई पोस्ट
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
फ़ॉलोअर
ब्लॉग आर्काइव
▼
2014
(9)
▼
अगस्त
(1)
कविता तुम ...
►
जुलाई
(2)
►
अप्रैल
(2)
►
मार्च
(1)
►
फ़रवरी
(1)
►
जनवरी
(2)
►
2013
(21)
►
दिसंबर
(1)
►
नवंबर
(1)
►
अक्टूबर
(2)
►
सितंबर
(2)
►
अगस्त
(3)
►
जुलाई
(2)
►
जून
(2)
►
मई
(2)
►
अप्रैल
(1)
►
मार्च
(1)
►
फ़रवरी
(2)
►
जनवरी
(2)
►
2012
(25)
►
दिसंबर
(3)
►
नवंबर
(3)
►
अक्टूबर
(3)
►
सितंबर
(1)
►
अगस्त
(3)
►
जुलाई
(1)
►
जून
(1)
►
मई
(1)
►
अप्रैल
(2)
►
मार्च
(3)
►
फ़रवरी
(2)
►
जनवरी
(2)
►
2011
(33)
►
दिसंबर
(3)
►
नवंबर
(2)
►
अक्टूबर
(2)
►
सितंबर
(2)
►
अगस्त
(3)
►
जुलाई
(1)
►
जून
(4)
►
मई
(4)
►
अप्रैल
(4)
►
मार्च
(4)
►
फ़रवरी
(2)
►
जनवरी
(2)
►
2010
(17)
►
दिसंबर
(3)
►
नवंबर
(2)
►
सितंबर
(2)
►
अगस्त
(3)
►
जुलाई
(1)
►
जून
(4)
►
अप्रैल
(2)
►
2009
(9)
►
दिसंबर
(2)
►
अक्टूबर
(1)
►
सितंबर
(3)
►
जुलाई
(2)
►
जनवरी
(1)
►
2008
(5)
►
सितंबर
(1)
►
जून
(3)
►
जनवरी
(1)
►
2007
(9)
►
दिसंबर
(1)
►
अक्टूबर
(3)
►
सितंबर
(5)
मेरे बारे में
Suman
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें