सबको अपनी -अपनी माँ प्यारी होती है
मुझको अपनी माँ सबसे प्यारी लगती है
सरल सुंदर मन की मधु मिश्री -सी मीठी,
माँ प्रेम और ममता की सरिता लगती है!
मेरी हर उलझन को चुटकी में सुलझाती,
घर को सजाकर कैसे सुंदर स्वर्ग बनाती,
माँ कभी पहेली तो कभी सहेली लगती है !
मेरी ख़ुशी में वह खुशीसे खिल जाती,
दुःख में मेरे फूल -सी मुरझाती,
माँ आँगन की फुलवारी लगती है !
कमजोर होता है जब मन लडखडाते है कदम,
अपने विश्वास भरे हाथों से थाम,
माँ कोई अनजानी प्रेरणा लगती है !
सुघड़ हाथो से तराश -तराश कर शिल्प बनाती ,
माँ है विश्वास,माँ है प्रेरणा ,माँ सर्वश्रेष्ट
भगवान की अनुपम भेट लगती है !
सोमवार, 14 जून 2010
मंगलवार, 8 जून 2010
चंदामामा की शादी है
चंदामामा की शादी है
उजली पोशाकों में,
तारे सजे बाराती है
ढोल नगाड़े बाजे बजते है
झुमझुम कर ताल पर बाराती
सब नाचते है
आतिश अनारों के साथ
जब फुलझड़ियाँ छुटती है
झिलमिल रौशनिसे
धरती आकाश नहाते है
सजधज कर युवतियां जब
मटक-मटक कर चलती है
अनब्याहे यूवावों के दिल
धड़क -धड़क जाते है
पूनम की रात है मेहमानोंका
स्वागत है!
दुल्हन के घरवाले
दुल्हे वलोंकों
चांदी की सुराई से
चांदी के प्यालों में भरभर कर
शरबत पिलाते है
बादल कहार गगन की डोली
सितारों जड़े घूँघट में
दुल्हन शरमाई
मंगल धुन बजी शहनाई
चंदामामा की शादी की
शुभ घडी है आई !
उजली पोशाकों में,
तारे सजे बाराती है
ढोल नगाड़े बाजे बजते है
झुमझुम कर ताल पर बाराती
सब नाचते है
आतिश अनारों के साथ
जब फुलझड़ियाँ छुटती है
झिलमिल रौशनिसे
धरती आकाश नहाते है
सजधज कर युवतियां जब
मटक-मटक कर चलती है
अनब्याहे यूवावों के दिल
धड़क -धड़क जाते है
पूनम की रात है मेहमानोंका
स्वागत है!
दुल्हन के घरवाले
दुल्हे वलोंकों
चांदी की सुराई से
चांदी के प्यालों में भरभर कर
शरबत पिलाते है
बादल कहार गगन की डोली
सितारों जड़े घूँघट में
दुल्हन शरमाई
मंगल धुन बजी शहनाई
चंदामामा की शादी की
शुभ घडी है आई !
रविवार, 18 अप्रैल 2010
छंद रचने के क्षण
रात के क्षण
सुबह से शाम
भागते दौड़ते
थक गया तन
जग की राहे
सुबह से शाम
कहते सुनते
उब गया मन
जग से बाते
छाया तम है
गहरा
निर्जन रात
एकांत चारो और
रजनी का पहरा
उद्वेलित श्वास
मन उदास
आंखे नम है
क्यों उमड़ने
लगी आज फिर से
भग्न अंतर की
निराशा
छंद रचने के क्षण !
सुबह से शाम
भागते दौड़ते
थक गया तन
जग की राहे
सुबह से शाम
कहते सुनते
उब गया मन
जग से बाते
छाया तम है
गहरा
निर्जन रात
एकांत चारो और
रजनी का पहरा
उद्वेलित श्वास
मन उदास
आंखे नम है
क्यों उमड़ने
लगी आज फिर से
भग्न अंतर की
निराशा
छंद रचने के क्षण !
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
हाईटेक हुए है बाबाजी
ऐसा कोई दिन नहीं है
ऐसी कोई रात नहीं
जहाँ नित नए किस्से
दिलचस्प घटनाये
न हो ऐसा कोई
शहर नहीं है
साधू संत ग्यानी
आजकल हर टी .वी
चैनलों पर छाए है
हाईटेक हुए है
बाबाजी!
ये है सब सत्ता के
उपासक
कनक कामिनी के
पुजारी!
इनका काम है
पाखंड रचकर छलना
जग को इनके नाम अनेक
पर लक्ष एक
सत्ता , रुपया, शासन
सुनो कुछ गुनो तो
क्या कहता है
शास्त्र पूरान
कण -कण में भगवान
फिर इनको है
क्या काम !
आजकल दुनिया में
येही तो हो रहा है
उनमे इनमे कोई
भेद नहीं है
एक जैसी कूटनीति
एक सा योप्आर
फल फुल रहा है
बड़ा सूक्ष्म भेद है
दोनों में
वे करते है
देश के नाम
ये करते है
भगवान के !
ऐसी कोई रात नहीं
जहाँ नित नए किस्से
दिलचस्प घटनाये
न हो ऐसा कोई
शहर नहीं है
साधू संत ग्यानी
आजकल हर टी .वी
चैनलों पर छाए है
हाईटेक हुए है
बाबाजी!
ये है सब सत्ता के
उपासक
कनक कामिनी के
पुजारी!
इनका काम है
पाखंड रचकर छलना
जग को इनके नाम अनेक
पर लक्ष एक
सत्ता , रुपया, शासन
सुनो कुछ गुनो तो
क्या कहता है
शास्त्र पूरान
कण -कण में भगवान
फिर इनको है
क्या काम !
आजकल दुनिया में
येही तो हो रहा है
उनमे इनमे कोई
भेद नहीं है
एक जैसी कूटनीति
एक सा योप्आर
फल फुल रहा है
बड़ा सूक्ष्म भेद है
दोनों में
वे करते है
देश के नाम
ये करते है
भगवान के !
रविवार, 13 दिसंबर 2009
एक कविता को छोड़कर
हमने जीवन को
कब समझा कब जाना
यूह्नी जीवन को वेर्थ गवांया
किंतु जीते -जीते
एक दिन पता चला
जिसको हमने जीवन समझा
वह जीवन नही
मृत्यु के द्वार पर
खड़ी हुई मनुष्य की
लम्बी कतारे है
कोई अब गया कोई
कल कोई परसों जाएगा
देर सवेर की बात है
खोजने पर भी उनके
नही मिलेंगे निशान
जैसे पानी पर खींची
गई हो लकीरे
बन भी नही पाती
की मिट जाती है
ऐसे ही पल में सब कुछ
मिटा देती है मृत्यु
एक कविता को छोड़कर!
कब समझा कब जाना
यूह्नी जीवन को वेर्थ गवांया
किंतु जीते -जीते
एक दिन पता चला
जिसको हमने जीवन समझा
वह जीवन नही
मृत्यु के द्वार पर
खड़ी हुई मनुष्य की
लम्बी कतारे है
कोई अब गया कोई
कल कोई परसों जाएगा
देर सवेर की बात है
खोजने पर भी उनके
नही मिलेंगे निशान
जैसे पानी पर खींची
गई हो लकीरे
बन भी नही पाती
की मिट जाती है
ऐसे ही पल में सब कुछ
मिटा देती है मृत्यु
एक कविता को छोड़कर!
सोमवार, 7 दिसंबर 2009
पलछिन
रुतु ने करवट बदली
मौसम हुवा रंगीला
सरसर -सरसर बहती
ठंडी चले पुरवा
कंपकपाती सर्द हवा
शीतल सब गात
धरती के आगोश में
ऊँघ रही है रात
उलझी-उलझी अलके
अलसाये नयन
उस पर याद
तुम्हारी आयी
भटक गया पलभर
न जाने कहाँ ये
स्वप्न पंखी मन
पलकों पर ठहर गया
कोई अंजाना स्वप्न
मानो ठिटक पल में छीन गया !
मौसम हुवा रंगीला
सरसर -सरसर बहती
ठंडी चले पुरवा
कंपकपाती सर्द हवा
शीतल सब गात
धरती के आगोश में
ऊँघ रही है रात
उलझी-उलझी अलके
अलसाये नयन
उस पर याद
तुम्हारी आयी
भटक गया पलभर
न जाने कहाँ ये
स्वप्न पंखी मन
पलकों पर ठहर गया
कोई अंजाना स्वप्न
मानो ठिटक पल में छीन गया !
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
आई दिवाली
उमंग उल्लास है मन पर छाया
जगमग -जगमग दीपों का त्यौहार
आया !
मन्मन्दिर में झिलमिल दीप जलाओ,
दीपावली का पावनपर्व मनाओ !
पटाखे फुलझडीयां बहुत ना जलाओ,
पर्यावरण को दूषित होनेसे बचाओ!
रोज शहरोंमे प्रदुषण बढ़ रहा है,
अनेक बिमारियोंसे मानव लड़ रहा है!
मेहनत की कमाई, पॉवर है मनी
बारूद में उडाकर क्यों करे मनमानी !
शान आडम्बर का वेर्थ है ,दिखावा
जीवन है अनमोल सादगीभरा !
हर तीज त्यौहार पर मिठाई मेवा .........
किसी के घर में मुश्किल से जलता
चूल्हा !
हर मौज मस्ती में
जगमग उजियारा
किसी घरमें
दुःख दर्द है अँधियारा !
घर -घर में प्रेम के दीप जलाओ,
सुमन का यह शुभ संदेश पहुँचाओ !!
आई दीवाली जगमग दीप जलाओ !!
जगमग -जगमग दीपों का त्यौहार
आया !
मन्मन्दिर में झिलमिल दीप जलाओ,
दीपावली का पावनपर्व मनाओ !
पटाखे फुलझडीयां बहुत ना जलाओ,
पर्यावरण को दूषित होनेसे बचाओ!
रोज शहरोंमे प्रदुषण बढ़ रहा है,
अनेक बिमारियोंसे मानव लड़ रहा है!
मेहनत की कमाई, पॉवर है मनी
बारूद में उडाकर क्यों करे मनमानी !
शान आडम्बर का वेर्थ है ,दिखावा
जीवन है अनमोल सादगीभरा !
हर तीज त्यौहार पर मिठाई मेवा .........
किसी के घर में मुश्किल से जलता
चूल्हा !
हर मौज मस्ती में
जगमग उजियारा
किसी घरमें
दुःख दर्द है अँधियारा !
घर -घर में प्रेम के दीप जलाओ,
सुमन का यह शुभ संदेश पहुँचाओ !!
आई दीवाली जगमग दीप जलाओ !!
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