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Main aur Meri Kavitayen
रविवार, 21 जुलाई 2013
तुम्हारी दी हुई रौशनी …
सुबह से शाम
चलने को
चलती हूँ
दुनिया की
भीड़ में
दुनिया के
साथ …
आहिस्ता -आहिस्ता
तम की ,
अँधेरी सुरंग में
तुम्हारी
दी हुई
रौशनी
ओढ़ कर
उस रौशनी के
साथ …।
शुक्रवार, 5 जुलाई 2013
भावना में बह गये कविता के छंद ...
बारिश भी ,
बड़ी अजीब होती है
कहीं बूंद-बूंद को
मानव तरसे
कहीं
बाढ़ ले आयी ...
कही बारिश
साथ ले आयी किसी की
यादों की सौंधी
गंध
भावना में बह गये
कविता के
छंद ...!
मंगलवार, 25 जून 2013
प्रेम शब्द, जिसमे जादू है ....
अनेक शब्द,
लोक-व्यवहार
के चलते
भले ही अपने
अर्थ, उपयोगिता
खो रहे हो
लेकिन प्रेम
अब भी
ऐसा शब्द है
जिसमे जादू
है ...!
***
किसी से हम
इसलिये प्रेम
करते है कि,
उससे हमारी
सारी मनोकामनायें
पूरी होंगी
तब समझ लेना
हम उससे
प्रेम नहीं
प्रेम करने का
बहाना कर
रहे है ....!
बुधवार, 19 जून 2013
एकता का महत्व ....
एक दिन ,
रंगों में बहस छिड़
गई
कि ,वही सबसे
अच्छा रंग है ..
"मै जीवन व आशा का
प्रतीक हूँ हरे रंग ने
दावा किया " ..
"मै आसमान व समुद्र की
गहराई का प्रतीक हूँ
मेरे बिना जीवन में
शांति ,सुख असंभव है
नीले रंग ने दावा किया "...
इस प्रकार से हर रंग
अपनी-अपनी योग्यता का
बखान करने लगे ...
इतने मे ,
आसमान में जोर-जोर से
बिजली कडाड कडकी
काले -काले बादल छा गए
जोर की वर्षा होने के
आसार दिखाई देने लगे !
सारे रंग बिखरने के
डर से एक दूसरे के
पास आने लगे
एक दूसरे का हाथ
थाम कर
आकाश में
इन्द्रधनुष बन कर
दुनिया को
एकता का
पाठ पढ़ा कर
यह सन्देश
देने
लगे कि ,
हर रंग एक दुसरे के
बिन अधुरा है .....!!
मंगलवार, 28 मई 2013
छंद सधते नही है आज ...
आज,
अक्षर-अक्षर
बिखर रहे है
छंद सधते नहीं
रूठ गये है
सहज सरल
भाव मन के ..,
कैसे हो स्वर
साधन ?
कुछ अधिक
ढीले ढाले है
कुछ अधिक
कसे हुए है
मन वीणा के
तार आज ...!
गुरुवार, 9 मई 2013
फूलों के बीज ....
मानसून आते ही
ठंडी-ठंडी हवायें
सरसराने लगती है
हृदयाकाश में छाये
भावों के मेघ
मन की धरती पर
बरसने को उतावले
हो जाते है ...
बारिश की इन
भाव भरी रिमझिम
फुहारों से जब
मन की मिट्टी
गीली होने लगती है
तब बो देती हूँ
इस गीली मिट्टी में
फूलों के
मन पसंद बीज
और जब यह बीज
टूटकर,गलकर
अंकुरित हो
पौधे हवावों की
सरसराती ताल पर
फूलों सहित
झूम झूम कर नाचने,
गीत गाने लगते है
तब फूलों की
इस सुगंध से
सारा जीवन महकने
लगता है जैसे .....!
( फूलों के बीजों का अभाव है
नहीं तो मिट्टी में भी फूल
छिपे होते है ..)
शनिवार, 13 अप्रैल 2013
नानी के गाँव है जाना ... ( बालकविता )
ना कुछ सीखना,
ना समर कैंप में जाना
मुझे तो छुट्टियों में
नानी के गाँव है जाना ...
जहाँ,
कल-कल नदी एक बहती
मधुर नाद सुनाती रहती
गीली रेत पर नंगे पैर चलना
ढेर सारी है सीपियाँ बटोरना
नानी के गाँव है जाना ...
शीतल स्पर्श वह पानी का
पैरों को गुदगुदाना मछलियों का
आटे की गोलियाँ बना-बनाकर
उनको है खिलाना
नानी के गाँव है जाना ...
हरी-भरी वनराई और
वनराई में गूँजता है जब
चरवाहे के बन्सी का स्वर
नाच उठता मन मयूर
वन-उपवन में है विचरना
नानी के गाँव है जाना ....
आमों की अमराई
और ममता की छाँव
भोले-भाले लोग
प्यारा-सा वो गाँव
डफली की ताल पर
लोकगीत है सुनना
नानी के गाँव है जाना ...!!
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