मन,
जीवन है अगर गीत तो,
क्यों न तुम भी गीत गाओ ...
रात ने कहा भोर से अंतिम विदा
चाँद ने कहा चांदनी से अलविदा
ओस बिखर कर पात पर मोती बनी
हर कली मुस्कुरा कर पुष्प बन कर खिली
इतराती संग हवा के मस्त सुरभि चली
जब भौरों ने कहा रुनझुन-रुनझुन
क्यों न तुम भी गुनगुनाओ ....
पंछियों की मधुर कलरव
तितलियों की लुकछिप-लुकछिप
खेल खेलती तरु-तरु पर
तन की काली श्यामल-श्यामल
मीठे गीत गाती है कोयल
जब डोलता है संसार सारा
क्यों न तुम भी डोल जाओ
जीवन है अगर गीत तो
क्यों न तुम भी गीत गाओ....